gypsy in the rain


ना जाओ तुम गोकुल, कान्हा…
March 30, 2010, 11:48 pm
Filed under: Uncategorized

ना जाओ कान्हा अब तुम गोकुल
के राधा तुम्हे हर दिन कोसे …
बैठी थी हर दिन वो आस लगाए ..
हर दिन वो आंसू पोंछे..

है संसार में जो भी वो रिश्ते निभाये..
ना कोई रिश्ता था झूठा
एक तुम चले गए मथुरा, छोड़ उसे….
तबसे उसका खुदसे रिश्ता टुटा..

हर नारी धर्म निभाया उसने..
खुद रही तुझ बिन अधूरी..
तेरे नाम से पहले लिखते उसका नाम..
पर उसकी आँखे रही कोरी..

ना किसीको थी उससे शिकायत…
के प्यार ना उसने दिया…
पर कान्हा, तेरी याद में..,
दोहरी जिंदगी का हर पल है उसने जिया…

तुम जब थे मगन अपनी जिंदगी में…
राधा रोई यमुना किनारे..
तुम तो थे हर किसी के पर…
राधा थी जिंदा तेरी बांसुरी के सहारे…

माना के तुम आये थे यहाँ…
सब कुछ था लिखा पहले से…
छोड़कर क्यों गए तुम उसको..
देकर सारे दिन ठहरे से…

ठहरे से है दिन उसके बचपन में…
जब कान्हा तुझ से वो झगड़ती थी…
अरे दुष्ट, उसे छोड़कर न जाता…
कितना प्यार भी तो वो तुझ से करती थी…

तू है बड़ा स्वार्थी, कान्हा…
तुझे उठाना था गोवर्धन अपनी ऊँगली पे…
हर सांस वो लेती रही तेरे नाम से…
कान्हा था विराज उसके चेहरे पे…

अब तू जा तो रहा है गोकुल,
पाने मुक्ति उसके बंधन से….
न वो तुझे जाने देगी अब…
तुझे बाँध रखा अपने आँगन में….

तू होगा राजा कही का…
होगा देवता किसी का….
दर्द दिया तुने राधा को इतना…
के जन्मो तक तू बंधा रहेगा उसीका…

दर्द का रिश्ता दिया है तुने उसको…
सींचा राधा ने उसको अपनी आँखों से…
अब जो तू निकला है आखरी सफ़र पे….
निकल नहीं सकता तू उलझी राहो से….

तू निकल नहीं सकता, कान्हा….
उन उलझी राहो से….
ना जाना तुम गोकुल, कान्हा…
जल उठोगे राधा की आहो से…

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